ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट में बनेगी नई पीठ

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए ‘क्रीमी लेयर’ के नियम तय करने के लिए दो साल का समय मांगा है। साथ ही, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत तथा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी मोहना की पीठ से 11 मार्च के उस फैसले को पिछली तारीख से लागू करने के खिलाफ अपनी अर्जी पर जल्द सुनवाई की मांग की है। इस फैसले में सार्वजनिक इकाइयों (पीएसयू) या प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले माता-पिता की सैलरी के आधार पर ओबीसी उम्मीदवारों के वर्गीकरण (क्रीमी लेयर) को खारिज कर दिया गया था।

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच से रोहित नाथन मामले में 11 मार्च के फैसले पर कुछ स्पष्टीकरण मांगने वाली अर्जी को लिस्ट करने का अनुरोध किया। वकील वरुण ठाकुर ने इसका विरोध करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कानून तय कर चुका है।

तुषार मेहता ने कहा केंद्र सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा या उसमें बदलाव नहीं चाहता, बल्कि कोर्ट को पिछली तारीख से इसे लागू करने में आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों के बारे में बताना चाहता है।

तुषार मेहता ने कहा कि इसके लिए ‘क्रीमी लेयर’ ओबीसी उम्मीदवारों के पुराने बैच का स्टेटस बदलकर ‘नॉन-क्रीमी’ करना होगा और सिविल सर्विस में उनके कैडर, पद और सर्विस में बदलाव करना होगा। इससे आईएफएस, आईएएस और आईपीएस जैसे कैडर और सर्विस में लंबे समय से काम कर रहे उतने ही उम्मीदवारों के लिए भी इसी तरह के बदलाव करने होंगे, जिससे अफरातफरी मच जाएगी।

तुषार मेहता ने कहा कि वह सिर्फ जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की बेंच के सामने जल्द सुनवाई के लिए अर्जी लिस्ट करने का अनुरोध कर रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश ने 1 सितंबर को अर्जियों को लिस्ट करने पर सहमति जताई।

अपनी अर्जी में केंद्र ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करने में आने वाली गंभीर चुनौतियों और नतीजों को देखते हुए सरकार एक ऐसी पॉलिसी लाने के लिए प्रतिबद्ध है जो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर प्रभावी ढंग से अमल करे और साथ ही यह भी सुनिश्चित करे कि पॉलिसी का सीधा और परोक्ष असर निष्पक्ष और न्यायपूर्ण हो।’

सरकार ने कहा कि अगर बिना किसी उचित पॉलिसी के 11 मार्च के फैसले को लागू किया जाता है, तो केंद्र और 18 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों द्वारा की जाने वाली सरकारी भर्तियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिलों पर इसका दूरगामी असर पड़ेगा।

सरकार ने कहा कि रेलवे, बैंक, डाक विभाग और पैरामिलिट्री जैसे बड़े संगठनों और नियोक्ताओं के पास ‘क्रीमी लेयर’ के पुराने समय से लागू होने वाले नए वर्गीकरण की मांग करने वाली लाखों अर्जियां और कानूनी मामले आ सकते हैं।

दरअसल 1992 के इंदिरा साहनी फैसले के बाद सरकार ने 8 सितंबर 1993 को एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया था। इसमें ओबीसी क्रीमी लेयर की पहचान करने के नियम बताए गए थे, जिन्हें आरक्षण के फायदों से बाहर रखा जाना था।

11 मार्च 2026 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि क्रीमी लेयर का दर्जा तय करने का आधार 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम में बताए गए काम-धंधे की कैटेगरी होनी चाहिए। साथ ही, प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले माता-पिता की आय के आधार पर अपने आप यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आता है। केंद्र सरकार ने 11 मार्च 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रभाव और उसकी पिछली तारीख से लागू होने को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है।

सरकार चाहती है कि कम से कम सिविल सेवा परीक्षा2025 और 2026 की प्रक्रिया को पुराने क्रीमी लेयर नियमों के आधार पर आगे बढ़ाने की अनुमति दी जाए। इसी मांग पर विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने विशेष पीठ गठित करने पर सहमति जताई है।

विवाद की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन’ मामले में 11 मार्च 2026 के फैसले से हुई। दो सदस्यीय पीठ ने कहा था कि ओबीसी उम्मीदवार के माता-पिता की सैलरी या आय को अकेले आधार बनाकर क्रीमी लेयर तय नहीं की जा सकती। खास तौर पर पीएसयू या निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता के मामले में केवल वेतन को देखकर उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में डालना उचित नहीं होगा।

अदालत ने स्पष्ट किया था कि 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम में निर्धारित व्यवस्था के तहत माता-पिता के पद, सेवा की श्रेणी और सामाजिक स्थिति को भी देखा जाना जरूरी है। 14 अक्टूबर 2004 का स्पष्टीकरण पत्र 8 सितंबर 1993 के मूल ऑफिस मेमोरेंडम की व्यवस्था को बदल या उसके ऊपर हावी नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना था कि समान स्थिति वाले सरकारी कर्मचारियों और पीएसयू/निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के साथ केवल वेतन के आधार पर अलग-अलग व्यवहार करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 में निहित समानता के सिद्धांत के खिलाफ हो सकता है। अदालत के अनुसार क्रीमी लेयर का उद्देश्य ओबीसी के सामाजिक रूप से उन्नत वर्ग को आरक्षण से बाहर रखना है, न कि समान स्थिति वाले लोगों के बीच कृत्रिम भेद पैदा करना।

केंद्र की चिंता यह भी है कि अगर केवल आय को निर्णायक नहीं माना गया और पद की समकक्षता तय नहीं हुई, तो बहुत अधिक आय वाले कुछ उम्मीदवार भी ओबीसी नॉन क्रीमी लेयर के दायरे में आ सकते हैं। सरकार ने दलील दी है कि इससे वास्तव में संसाधन-विहीन और जरूरतमंद ओबीसी उम्मीदवारों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

11 मार्च का मूल फैसला जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने दिया था, लेकिन अब दोनों जज अलग-अलग पीठों में हैं। इसके बाद चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि “हमें एक विशेष पीठ गठित करनी होगी” और उन्होंने संबंधित जजों से चर्चा कर पीठ गठित करने की बात कही।

सरकार ने अपनी याचिका में साफ किया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के फैसले को कमजोर या दरकिनार करने की मांग नहीं कर रही है। उसका आग्रह केवल यह है कि फैसले को सीएसई-2025 और 2026 जैसी चल रही या पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं पर किस तरह लागू किया जाए, इसे स्पष्ट किया जाए। केंद्र ने इसके लिए भविष्य की प्रक्रियाओं पर फैसले को लागू करने के सिद्धांत का भी हवाला दिया है। सरकार का तर्क है कि सीएसई -2025 की चयन प्रक्रिया 11 मार्च के फैसले से पहले पूरी हो चुकी थी और उम्मीदवारों ने उस समय लागू नियमों के आधार पर परीक्षा दी थी।

अब विशेष पीठ के गठन और उसकी सुनवाई से यह तय होगा कि 11 मार्च के फैसले का सीएसई-2025 और सीएसई-2026 पर क्या प्रभाव पड़ेगा और पुराने नियमों के आधार पर किए गए चयन तथा भविष्य में लागू होने वाली क्रीमी लेयर व्यवस्था के बीच कानूनी संतुलन कैसे बनाया जाएगा।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

Leave a Reply